कविता

रेत  के  टीलों  में  दफ़न
संस्कारों   की  पोटली
चरण   चुम्बक   बन
हिमालय  से  ठिठोली
घास  के   मैदान   शुष्क
गुमां  में   द्वीपों  की  टोली

पत्तियां  पीली , हवा नम
जंगल को  है  कोई  गम
धूल , कंकड़ , सूखे  पत्ते
पंचायत  में  गिरते  बम
मन  खाली  देते  गाली
जंगल  के  है  गुंडे  हम

गीला  बिस्तर  फटी  चटाई
पैसे  की  सर्दी  ने  आग  जलाई
कंबल  ओढ़े   लोकतंत्र  आया
जातिवाद - धर्म  ने  उत्पात  मचाया
इतिहास  की  हुई   खूब  पिटाई
संविधान  ने  जाकर  लाज बचाई।।

आकिब जावेद

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4 टिप्पणियाँ

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