रेत के टीलों में दफ़न
संस्कारों की पोटली
चरण चुम्बक बन
हिमालय से ठिठोली
घास के मैदान शुष्क
गुमां में द्वीपों की टोली
पत्तियां पीली , हवा नम
जंगल को है कोई गम
धूल , कंकड़ , सूखे पत्ते
पंचायत में गिरते बम
मन खाली देते गाली
जंगल के है गुंडे हम
गीला बिस्तर फटी चटाई
पैसे की सर्दी ने आग जलाई
कंबल ओढ़े लोकतंत्र आया
जातिवाद - धर्म ने उत्पात मचाया
इतिहास की हुई खूब पिटाई
संविधान ने जाकर लाज बचाई।।
आकिब जावेद
4 टिप्पणियाँ
संविधान कैसे किसी की लाज बचा सकता है? आए दिन तो संविधान का ही चीर-हरण होता है.
जवाब देंहटाएंसही कहा बिल्कुल सर
हटाएंइतिहास की हुई खूब पिटाई
जवाब देंहटाएंवो दिखाई दे रही है आज :)
बहुत बहुत शुक्रिया आपका सर
हटाएंआपके स्नेहपूर्ण शब्दों और बहुमूल्य टिप्पणी के लिए हार्दिक धन्यवाद।
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