डायरी का अंश (31.01.2026)
"रिक्शे में बैठा सपना"
आज मुझे डायट, बांदा में स्कूल रेडिनेस प्रशिक्षण के लिए जाना हुआ। अत्यधिक ठंड के कारण घर से नहा-धोकर, नाश्ता करके बस से बांदा पहुँचा। बस से उतरकर रिक्शा पकड़ने के लिए ब्रिज के नीचे किसी रिक्शेवाले को ढूँढ़ रहा था। अधिकतर रिक्शे बाबूलाल चौराहे की ओर जा रहे थे। तभी एक रिक्शा ऐसा दिखा, जो मेरे गंतव्य की ओर जा रहा था।
रिक्शा एक बालक चला रहा था। उसने मुझे आगे ही बैठा लिया। शीतलहर के कारण मैंने मफलर से अपना चेहरा ढक रखा था। रास्ता बहुत लंबा नहीं था। बातचीत के दौरान मैंने उससे उसकी उम्र पूछी। वह झेंप गया और कुछ नहीं बोला। मैंने अंदाज़ से कहा—“तुम पंद्रह साल के होगे?” उसने धीरे से कहा—“हाँ।”
मैंने पूछा, “पढ़ते भी हो?”
उसने बताया, “कक्षा 9 में पढ़ता हूँ। पिताजी गाँव गए हैं, दादी की तबियत ठीक नहीं है, इसलिए आज मैं रिक्शा चला रहा हूँ।”
बातचीत आगे बढ़ी तो मैंने पूछा, “कहाँ रहते हो?”
उसने कहा, “यहीं किराये पर रहते हैं। घर में एक छोटा भाई है, जो चौथी में पढ़ता है। मम्मी-पापा दोनों हैं।”
मैंने पूछा, “भाई कहाँ पढ़ता है?”
तपाक से बोला—“सरकारी में। हम गरीब हैं, सरकारी में ही पढ़ेंगे।”
उसके चेहरे के भाव देखने लायक थे—संकोच भी था और सच्चाई का साहस भी।
तभी मेरी मंज़िल आ गई। मुझे जीईसी के सामने उतरना था। उतरते समय वह हँसते हुए बोला—“आप यहीं हैं क्या?”
मैंने कहा, “नहीं बेटा, डायट जाना है।”
तो मुस्कुराकर बोला—“आप टीचर हैं क्या?”
मैं मन ही मन मुस्कुरा उठा। हाँ, मैं शिक्षक हूँ—सरकारी स्कूल का शिक्षक, जहाँ बच्चों के भविष्य का निर्माण होता है। हमें अपने कर्तव्यों के प्रति सदैव सचेत रहना चाहिए।
सरकारी विद्यालयों में वही बच्चे आते हैं, जिनके सपनों में जान होती है। हमें सरकारी विद्यालयों को प्राइवेट स्कूलों की तरह विकसित करना चाहिए, ताकि जब कोई बच्चा कहे—“मैं सरकारी स्कूल में पढ़ता हूँ”, तो उसे गर्व की अनुभूति हो।
हमें अपना शत-प्रतिशत प्रयास करना चाहिए। मेरा भी यही प्रयास है… यही मेरा संकल्प है—कुछ बेहतर करने का।
आकिब जावेद

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