माँ
माँ की ममता सा नही कोई भी देखा अपना
खून के आँसू से औलाद भी पाला अपना
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पोछने को नही आता यहाँ कोई आँसू
कौन है माँ के सिवाए हमें कहता अपना
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देखता तक नही औलाद वो जो साहब हो कर
माँ ने औलाद पे घर - बार लुटाया अपना
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ये घरौंदा जो बसाया पसीने से उसने
परवरिश में माँ ने सब कुछ तो लुटाया अपना
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बोल दो प्यार से तुम भी यूँ कभी बोले हो
माँ के जैसा न मिलेगा यहाँ सच्चा अपना
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माँ भी तकलीफों को सह लेती है हँस हँस कर के
दर्द में माँ के अलावा नही दूजा अपना
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रखकर फ़ाक़ा जिसने दी है उड़ान ये 'आकिब'
हूँ माँ के आगे मैं भी सर यूँ झुकाता अपना
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आकिब जावेद
2 टिप्पणियाँ
जी नमस्ते,
जवाब देंहटाएंआपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा सोमवार (04 मई 2020) को 'ममता की मूरत माता' (चर्चा अंक-3698) पर भी होगी।
आप भी सादर आमंत्रित हैं।
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रवीन्द्र सिंह यादव
मातृ दिवस पर सुन्दर प्रस्तुति।
जवाब देंहटाएंआपके स्नेहपूर्ण शब्दों और बहुमूल्य टिप्पणी के लिए हार्दिक धन्यवाद।
“आवाज़ सुखन ए अदब” परिवार में आपका स्वागत और सहयोग हमारे लिए प्रेरणा है।
आपका साथ ही साहित्यिक यात्रा को और सुंदर बनाता है।
इसी तरह अपना प्रेम और मार्गदर्शन बनाए रखें। 🌹