जेठ की तपती दुपहरी में
दहकते है पाठा के पहाड़
जानवर ढूंढते है पानी
पक्षियों को है
दाना - पानी का इंतेज़ार
नही बुझती है
प्यास धरा की
सूखे पेड़ अनायास करते रहते है कौतूहल
पाठा समेटे हुए है
स्वयं में
इतिहास,भूगोल,संस्कृति
दाना - पानी के इंतेज़ार में
पाठा के पहाड़।
4 टिप्पणियाँ
सुंदर
जवाब देंहटाएंबहुत बहुत धन्यवाद आपका
हटाएंBahut hi pyaari aur sateek rachna!
जवाब देंहटाएंबहुत बहुत धन्यवाद आपका
हटाएंआपके स्नेहपूर्ण शब्दों और बहुमूल्य टिप्पणी के लिए हार्दिक धन्यवाद।
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