ग़ज़ल - चढ़ने लगा है बोझ नया नौजवान पर

ग़ज़ल 

सपने  दिखाई  देते   नहीं  अब  जहान पर,
चढ़ने  लगा  है  बोझ  नया  नौजवान  पर।

हाथों में अपने हक़ की वो तख़्ती लिए खड़े,
पहरा  मगर  लगाया  गया  हर  ज़ुबान पर।

सड़कों पे अपने हक़ की सदा ले के हैं खड़े,
इल्ज़ाम फिर भी  मढ़ दिए हर नौजवान पर।

बैठे  हैं  धूप  ओ  धूल  में  उम्मीद  बाँधकर,
शायद  करम  की  बूँद  गिरे इस जहान पर।

आवाज़  को  दबा  के  ये  समझे हैं फ़त्ह है,
पहरे   कभी   लगे   हैं   भला  दास्तान  पर।

तख़्तों को क्या ख़बर है थके पाँव की चुभन,
चलना ही लिख दिया गया जिनके विधान पर।

हर दौर में सलीब मिली अहल-ए-सच को ही,
इल्ज़ाम  ही  लिखा  गया  उनकी ज़ुबान पर।

आकिब  झुके न सर तो वही अस्ल फ़त्ह है,
लिखता  रहूँगा  दर्द  मैं  हर  इम्तिहान  पर।

डॉ.आकिब जावेद

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