कविता - सुख और संघर्ष

दिन के बाद
रात उतरती है,
फिर भोर का जन्म भी
निश्चित होता है।

समय की चाल
कभी ठहरती नहीं,
हर मोड़ पर
रंग बदलती है।

सुख और संघर्ष
जीवन के दो छोर हैं,
जो जैसा स्वीकार करे,
वैसा ही निखरता है।

डॉ.आकिब जावेद 


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