डायरी के पन्नों से : कार्यशाला - प्रकृति संग्रहालय की स्थापना

डायरी के पन्नों से... कार्यशाला - प्रकृति संग्रहालय की स्थापना

दिनांक : 09.07.26

कुछ दिन पाठ्यपुस्तकों के लिए होते हैं और कुछ दिन जीवन स्वयं एक खुली पुस्तक बन जाता है। आज का दिन भी कुछ ऐसा ही था। कक्षा की चारदीवारी से बाहर निकलकर बच्चों ने प्रकृति को अपनी पाठशाला बनाया और सीखने की प्रक्रिया को अनुभवों से जोड़ा गया।

NCERT की कक्षा 4 की सारंगी के अंतर्गत पत्तियों के प्रकारों को समझाने के लिए विद्यालय प्रांगण में एक गतिविधि आधारित कार्यशाला आयोजित की गई। बच्चों को छोटे-छोटे समूहों में बाँटकर विद्यालय परिसर में स्थित विभिन्न पौधों और वृक्षों से पत्तियाँ एकत्रित करने का कार्य दिया गया। देखते ही देखते बच्चों की जिज्ञासा उन्हें हर पौधे के पास ले गई। कोई पत्ती के आकार को देखकर आश्चर्यचकित था तो कोई उसकी बनावट और रंग में अंतर खोज रहा था। किसी ने चिकनी पत्ती उठाई, किसी ने खुरदुरी; किसी को लंबी पत्ती आकर्षित कर रही थी तो किसी को गोलाकार पत्तियाँ।

जब सभी समूह अपनी-अपनी पत्तियाँ लेकर लौटे, तब कक्षा एक छोटे से 'प्रकृति संग्रहालय' का रूप ले चुकी थी। मेज़ पर सजी विभिन्न पत्तियाँ बच्चों के लिए अध्ययन सामग्री बन गईं। प्रत्येक समूह ने अपने द्वारा संकलित पत्तों का अवलोकन किया, उनके आकार, किनारों, शिराओं, रंग और विशेषताओं पर चर्चा की तथा अपने निष्कर्ष पूरी कक्षा के सामने साझा किए। बच्चों के प्रश्नों में जिज्ञासा थी और उत्तरों में अनुभव की सहजता देखी जा सकती थी।

आज बच्चों ने केवल पत्तियों के नाम नहीं सीखे बल्कि यह भी समझा कि प्रकृति का प्रत्येक रूप अपने भीतर कोई न कोई विशेषता समेटे हुए है। यह सीख किताबों के शब्दों से कहीं अधिक जीवंत और स्थायी थी।

इसी क्रम में NCERT संतूर के अंतर्गत क्राफ्ट गतिविधि का भी आयोजन किया गया। जिसमें बच्चों ने दिए गए प्रारूपों पर अपने हाथों से सुंदर कलाकृतियाँ तैयार कीं। रंग भरते समय उनकी एकाग्रता, रेखाओं का संतुलन, आकृतियों को सँवारने का धैर्य और कुछ नया करने का उत्साह स्पष्ट दिखाई दे रहा था। किसी ने अपने चित्र को अलग रूप दिया, तो किसी ने कल्पना के रंगों से उसे और भी आकर्षक बना दिया।

यह गतिविधि केवल एक क्राफ्ट निर्माण तक सीमित नहीं रही। इसने बच्चों के भीतर छिपी रचनात्मकता को अभिव्यक्ति दी। हाथों के कौशल को निखारा और यह विश्वास जगाया कि सीखना तभी सार्थक होता है जब उसमें स्वयं करने का अवसर मिले।

दिन भर बच्चों के चेहरों पर उत्साह की जो चमक थी वही इस गतिविधि की सबसे बड़ी उपलब्धि रही। आज उन्होंने देखा, छुआ, समझा, प्रश्न किए, उत्तर खोजे और अपने अनुभवों को साथियों के साथ साझा किया। यही तो शिक्षा का उद्देश्य है ज्ञान को जीवन से जोड़ना, जिज्ञासा को दिशा देना और सीखने को आनंदमय बनाना।

दिन के अंत में ऐसा लगा मानो विद्यालय के पेड़-पौधे भी बच्चों की इस जिज्ञासा पर मुस्कुरा रहे हों। किताबों के पन्नों में लिखे शब्द आज प्रकृति के बीच जीवंत हो उठे थे, और बच्चों ने महसूस किया कि सीखना केवल पढ़ना नहीं, बल्कि जीवन को ध्यान से देखना भी है।

कुछ स्मृतियाँ डायरी में लिखी जाती हैं और कुछ बच्चों की चमकती आँखों में हमेशा के लिए बस जाती हैं।आज का दिन उन खूबसूरत स्मृतियों में एक और पृष्ठ जोड़ गया। 

डॉ.आकिब जावेद 

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