तेरी मेरी कहानी तो यूँ जानी पहचानी है
इक प्यार का नगमा है मौजो की रवानी है
हम तुझपे ही अब मरते है हमदम सदा
ज़िन्दगी में लिखनी कोई अपनी कहानी है
मुक़द्दर से मिलता यूं कोई ख्वाब अंजाना
आके मिल जाए वो दिखानी कोई निशानी है
उन्हें बाद मुद्दत मिलने का मौका था मिला
उनका रखा नाक में गुस्सा तो खानदानी है
दुनिया में मुहब्बत की है मिशाल अलग अलग
जिंदगी में अब कोई अपनी मिशाल बनानी है
ये ज़न्नत दोज़ख़, ये सुख़ दुःख की बाते
बाद मरने के ख़ुदा से अब पूछने जानी है
इक दरिया इक कस्ती इक हमराह भी रहा
तूफानों से टकराते सफ़ीना को पार लगानी है
-आकिब जावेद
2 टिप्पणियाँ
निमंत्रण विशेष :
जवाब देंहटाएंहमारे कल के ( साप्ताहिक 'सोमवारीय' अंक 'सोमवार' १० सितंबर २०१८ ) अतिथि रचनाकारआदरणीय "विश्वमोहन'' जी जिनकी इस विशेष रचना 'साहित्यिक-डाकजनी' के आह्वाहन पर इस वैचारिक मंथन भरे अंक का सृजन संभव हो सका।
यह वैचारिक मंथन हम सभी ब्लॉगजगत के रचनाकारों हेतु अतिआवश्यक है। मेरा आपसब से आग्रह है कि उक्त तिथि पर मंच पर आएं और अपने अनमोल विचार हिंदी साहित्य जगत के उत्थान हेतु रखें !
'लोकतंत्र' संवाद मंच साहित्य जगत के ऐसे तमाम सजग व्यक्तित्व को कोटि-कोटि नमन करता है। अतः 'लोकतंत्र' संवाद मंच आप सभी का स्वागत करता है। धन्यवाद "एकलव्य" https://loktantrasanvad.blogspot.in/
बहुत बहुत धन्यवाद सर,जरूर सम्मलित होंगे सर।
जवाब देंहटाएंआपके स्नेहपूर्ण शब्दों और बहुमूल्य टिप्पणी के लिए हार्दिक धन्यवाद।
“आवाज़ सुखन ए अदब” परिवार में आपका स्वागत और सहयोग हमारे लिए प्रेरणा है।
आपका साथ ही साहित्यिक यात्रा को और सुंदर बनाता है।
इसी तरह अपना प्रेम और मार्गदर्शन बनाए रखें। 🌹