जिंदगी में अब कोई अपनी मिशाल बनानी है - आकिब जावेद

तेरी मेरी  कहानी  तो यूँ  जानी पहचानी है
इक प्यार का नगमा है मौजो की रवानी है

हम  तुझपे  ही  अब  मरते  है हमदम सदा
ज़िन्दगी में लिखनी कोई अपनी कहानी है

मुक़द्दर से मिलता यूं कोई ख्वाब अंजाना
आके मिल जाए वो दिखानी कोई निशानी है

उन्हें बाद मुद्दत मिलने का मौका था मिला
उनका रखा नाक में गुस्सा तो खानदानी है

दुनिया में मुहब्बत की है मिशाल अलग अलग
जिंदगी में अब कोई अपनी मिशाल बनानी है

ये ज़न्नत दोज़ख़, ये सुख़ दुःख की बाते
बाद  मरने के ख़ुदा से अब पूछने जानी है

इक दरिया इक कस्ती इक हमराह भी रहा
तूफानों से टकराते सफ़ीना को पार लगानी है

-आकिब जावेद

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2 टिप्पणियाँ

  1. निमंत्रण विशेष :

    हमारे कल के ( साप्ताहिक 'सोमवारीय' अंक 'सोमवार' १० सितंबर २०१८ ) अतिथि रचनाकारआदरणीय "विश्वमोहन'' जी जिनकी इस विशेष रचना 'साहित्यिक-डाकजनी' के आह्वाहन पर इस वैचारिक मंथन भरे अंक का सृजन संभव हो सका।

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  2. बहुत बहुत धन्यवाद सर,जरूर सम्मलित होंगे सर।

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