बूँद
हा,एक बूँद बारिश की
पड़ती है तेरे तन बदन में
पिघल उठता है मेरा मन
हा, वही बूँद बारिश की
जिसमे मिला था दो मन
समा गई थी जिसमे साँसे
नही रहा था होश कुछ भी
मन मष्तिष्क में सिर्फ तुम थी
और थी वो बूँदे,
हा, वही बूँदे बारिश की
जो आज भी कायम है
हा,मेरे आँखों में अश्रु बन कर।।
तेरी याद बन कर,बारिश की बूँद बनकर।।
-आकिब जावेद

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