ज़िन्दगी की चादर फैलाई
निकली अब चादर हरजाई
सूनी आँख ख्वाब गायब
रात भर यूँ नींद ना आई
ज़िन्दगी यूँ फिसलती रही
बन्द घड़ी कुछ ना बताई
ज़िन्दगी का सफर करना है
हर सफर में लिखी जुदाई
क्या राजा, क्या रंक यहाँ
वक्त ने यूँ औकात बताई
मुसाफ़िर थे मुसाफ़िर रहे
वक्त का पहिया ऐसे घुमाई
-आकिब जावेद
0 टिप्पणियाँ
आपके स्नेहपूर्ण शब्दों और बहुमूल्य टिप्पणी के लिए हार्दिक धन्यवाद।
“आवाज़ सुखन ए अदब” परिवार में आपका स्वागत और सहयोग हमारे लिए प्रेरणा है।
आपका साथ ही साहित्यिक यात्रा को और सुंदर बनाता है।
इसी तरह अपना प्रेम और मार्गदर्शन बनाए रखें। 🌹