हाथी को भी चित कर देती
-दिविक रमेश
सम्पर्क प्रकाशन, हनुमानगढ़ संगम, राजस्थान से अक्टूबर 2025 में प्रकाशित ‘हाथी को भी चित कर देती’ पुस्तक आकिब जावेद की 42 बाल कविताओं का संग्रह है। इनके गजल संग्रह और कविता संग्रह भी प्रकाशित हैं। ये अनेक सम्मानों से सम्मानित भी हैं।
कवि के मन की बात’ के अंतर्गत आकिद जावेद ने लिखा है, ‘ इसमे संकलित 42 कविताएँ बच्चों की जिज्ञासा, खेल, सपनों, प्रकृति और उनकी कल्पनाओं की उड़ान से प्रेरित हैं। हर कविता में मैंने कौशिश की है कि बच्चों के मन को छूने वाली बात हो, जिससे वे पढ़ते-पढ़ते मुस्कुरा भी सकें और सोचने को भी प्रेरित हों।“ साथ ही यह भी लिखा है, ‘मेरा विश्वास है कि कविता केवल शब्दों मेल नहीं, बल्कि हृदय की अनुभूतियों का उत्सव है।‘ पुस्तक में ही, इन बाल कविताओं को बाल मनोविज्ञान के अनुकूल मानते हुए बाल साहित्य मनीषी दीनदयाल शर्म न लिखा है- “ इस पुस्तक की बाल कविताएं सरल, सुबोध, सहज, तरल, रोचक, मनोरंजक, शिक्षाप्रद और बाल मनोविज्ञान के अनुकूल हैं।“
इन कविताओं को पढ़ते हुए पाठकों लगेगा कि आकिद जावेद ने भाषा-शिल्प और शिक्षा की दृष्टि से रचनात्मकता को प्राय: सुरक्षित रखा है। एक-आध अपवाद छोड़ दिया जाए तो कविता को मात्र सूचनात्मक या जानाकारीपूर्ण हो जाने से बचाया गया है। विषय की दृष्टि से भी देखा जाए तो विविधता पर्याप्त है। रिश्ते, जानवर, मोबाइल आदि नये उपकरण, ट्रिफिक, प्रकृति, खाद्य पदार्थ, कुपोषण, खेल, गुड़िया, मेला, फल, किताब, प्रजातंत्र आदि बुहुत कुछ है। यह सब अनुभवजन्य तो लगते ही हैं, इनकी अभिव्यक्ति में एक सकारात्मक दृष्टि भी पिरोयी गयी है। ‘ना बरबाद करें अन्न’ कविता का ही उदाहरण लें। शीर्षक से यह कविता उपदेशात्मकता का भ्रम देती है लेकिन जब कविता को पढ़ते हैं तो भारतीय मध्यवर्गीय परिवारों, बल्कि ग्रामीण समझ के परिवारों की एक जीवंत और सार्थक झलक का रचनात्मक आनंद मिलता जाता है। अंश देखिए-
मम्मी गेहूं लाई धोने,
आंगन के पहुंची वो कोने।
मोनू ने गेहूँ धुलवाए,
माँ का हरदम हाथ बंटाए।
मम्मी ने चादर फैलाई
गेंहूं को फिर धूप दिखाई।
मोनू ने फिर माँ से जाना
कैसे उपजे गेंहू दाना।
एक विशेषता जो पाठकों को अवश्य भाएगी वह है, कुछ कविताओं में शिल्प के आधार पर प्रयोगधर्मिता। अर्थात कहने के घिसेपिटे ढंग से अलग हट कर निजता और मौलिकता के साथ अपनी बात को रखना। ‘मेरी पेंसिल बहुत निराली’ की ये पंक्तियाँ देखिए-
जीवन पेंसिल-सा बनाएं
सही-सही बस करते जाएं।
भूल को पश्चाताप के जैसे
अपने हातों आप मिटाएँ।
‘तब घर अच्छा लगता है’ की ये पंक्तियाँ भी पढ़ी जाएं-
आंगन, बरोठा, अटरिया बाग,
भिन्न प्रकार के उगते हैं साग।
घर न होता तो कहां रहते पक्षी,
गर्मी, सर्दी, बारिश अच्छी न लगती।
मुझे विश्वास है कि अनेक कविताओं से समृद्ध यह संग्रह पाठकों को आवश्य अपनाने लायक लगेगा। कवि से भविष्य में और अधिक रचनात्मक बाल कविताओं, जिनमें समझ मित्रवत साझा की गई हो, ऊपर से चस्पा न की गई हो, की आशा बनी रहेगी। शुभकामनाएँ।
एल-1202, ग्रेंड अजनारा हेरिटेज, सेक्टर-74, नोएडा-201301
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