उनकी आदत है रूठ जाने की,
हमको तौफ़ीक़ दे मनाने की।
ज़ख़्म गहरे मिले हैं दुनिया से,
ग़म में आदत है मुस्कुराने की।
हाल बेहाल ज़िंदगी में हैं,
की है कोशिश भी आज़माने की।
ज़ख़्म गहरे बहुत ज़माने के,
सबकी साज़िश है आज़माने की।
आबरू लूट लेते अबला की,
जो क़सम खाए हैं बचाने की।
नौनिहालों को नेक राह दिखाएँ,
और कोशिश करो पढ़ाने की।
चाँद भी कुछ उदास लगता है,
रुत सितारों को जगमगाने की।
ان کی عادت ہے روٹھ جانے کی،
ہم کو توفیق دے منانے کی۔
زخم گہرے ملے ہیں دنیا سے،
غم میں عادت ہے مسکرانے کی۔
حال بے حال زندگی میں ہیں،
کی ہے کوشش بھی آزمانے کی۔
زخم گہرے بہت زمانے کے،
سب کی سازش ہے آزمانے کی۔
آبرو لوٹ لیتے ابلا کی،
جو قسم کھائے ہیں بچانے کی۔
نونہالوں کو نیک راہ دکھائیں،
اور کوشش کرو پڑھانے کی۔
چاند بھی کچھ اداس لگتا ہے،
رت ستاروں کو جگمگانے کی۔
डॉ.आकिब जावेद
#गज़ल #ख़्वाबों_के_दरम्यां ग़ज़ल संग्रह से
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