जुबा पर ताले पड़ गए
अब सबके जुबां पर ताले पड़ गए
तेजतर्रार भी ढीले ढाले पड़ गए
चढ़ गया हैं कुछ यूँ सत्ता का नशा
पैसेवाले भी उनकी नजर में बेचारे बन गए
नही पता कुछ गरीबो का क्या होगा अब
उन्ही का खून चूसकर हम नेता बन गए
अक्सर जब कभी भी किसी को मौक़ा मिलता
झटपट किसी भी नेता के साले बन गए
देश को अपने बेच कर पूंजीपतियों के हाथ
बड़े उधोगपतियों की हाथ की कठपुतली बन गए
सोच गरीब अब सोता हैं कल की कौन सोचेगा
निवाला उसका बेचकर कइयो के हवेली बन गए
माध्यम वर्गीय सोच कर खूब परेशान होता हैं
टैक्स दे दिया हैं फिर भी घर में ताले पड़ गए
कुछ मंहगाई कम हो अब सोच सोच परेसान हैं
इन परेशानियों से माथे पर लकीरे पड़ गए।।
-आकिब जावेद

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