कुछ लार्ज़िश सी हैं

कुछ लार्ज़िश सी हैं इन फिज़ाओ में अब
खुश्क हवाओ का खुद में नही कोई काबू अब


ठंडक सी दे रही हैं ये हवा इन फिज़ाओ में अब
तेरी मीठी यादो की लार्ज़िश मेरी सदाओं में अब


मुझे क्या हुआ खुद से बेखबर हु,बावला हूँ अब
याद करके सकूं मिलता हैं मुझे,शायद नींद में हूँ अब


थोड़ी सी बेचैन निगाहों को मुझसे मिलाना अब
क्या छुपा हैं तेरे अंदर,मैं पता करुगा अब


यूँ शर्मा कर चाँद को देखा चांदनी ने अब
शायद चाँद के प्यार में वो पागल हो गयी हैं अब


कुछ लार्ज़िश सी हैं उनकी बातो में अब
यूँ ही नही उनके लबो पर मेरा नाम हैं अब।।


-आकिब जावेद


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