बाल कविता - शरारती बंदर

पापा का चश्मा कमरे के अंदर,
उछल-उछल कर आया बंदर।
उलट-पुलट कर उसे लगाता,
खी-खी करके खूब हँसाता।
पापा फिर गुलेल ले आए,
बंदर को खूब मज़ा चखाए।

डॉ. आकिब जावेद 

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