पश्चिम और मध्य पूर्व : सत्ता, संघर्ष और शांति की तलाश
“जहाँ शक्ति का असंतुलन होता है, वहाँ संघर्ष अनिवार्य हो जाता है।” - यह विचार कई समाजशास्त्रियों द्वारा बार-बार दोहराया गया है। आधुनिक वैश्विक परिप्रेक्ष्य में यह कथन विशेष रूप से पश्चिमी देशों और मध्य पूर्व के बीच के संबंधों पर सटीक बैठता है। मध्य पूर्व, जो प्राकृतिक संसाधनों विशेषकर तेल और गैस से समृद्ध है, लंबे समय से वैश्विक शक्तियों के आकर्षण का केंद्र रहा है। पश्चिमी देशों की राजनीतिक, आर्थिक और सामरिक महत्वाकांक्षाएँ इस क्षेत्र में बार-बार हस्तक्षेप का कारण बनी हैं।
समाजशास्त्री इमैनुएल वालरस्टीन के विश्व-प्रणाली सिद्धांत के अनुसार, विश्व “कोर” और “परिधि” में विभाजित है, जहाँ कोर राष्ट्र (मुख्यतः पश्चिमी देश) संसाधनों और श्रम का दोहन करते हैं। इसी संदर्भ में मध्य पूर्व को परिधि के रूप में देखा जा सकता है, जहाँ बाहरी शक्तियाँ अपने हितों की पूर्ति हेतु हस्तक्षेप करती रही हैं। यह हस्तक्षेप केवल आर्थिक नहीं, बल्कि राजनीतिक और सांस्कृतिक भी रहा है, जिसने क्षेत्रीय अस्थिरता को बढ़ाया है।
मध्य पूर्व में चल रहे युद्ध--चाहे वह इज़राइल-फिलिस्तीन संघर्ष हो, यमन का गृहयुद्ध हो या सीरिया की स्थिति इन सभी में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से पश्चिमी देशों की भूमिका देखी जा सकती है। इन संघर्षों में “शांति स्थापना” के नाम पर किए गए हस्तक्षेप कई बार स्थिति को और जटिल बना देते हैं। समाजशास्त्री एंथनी गिडेन्स के अनुसार, “आधुनिकता के साथ जोखिम भी बढ़ते हैं,” और मध्य पूर्व इसका जीवंत उदाहरण है, जहाँ वैश्विक राजनीति के जोखिम स्थानीय जनजीवन को प्रभावित करते हैं।
हाल के वर्षों में युद्धविराम (ceasefire) की कई पहलें सामने आई हैं। संयुक्त राष्ट्र, क्षेत्रीय संगठन और विभिन्न राष्ट्र शांति स्थापित करने के लिए प्रयासरत हैं। परंतु ये प्रयास अक्सर अस्थायी सिद्ध होते हैं, क्योंकि इनके पीछे निहित स्वार्थ और शक्ति संतुलन की राजनीति बनी रहती है। शांति वार्ताओं में शामिल राष्ट्रों की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। कई देश मध्यस्थ के रूप में सामने आते हैं, जबकि कुछ अपने रणनीतिक हितों को साधने का प्रयास करते हैं।
यह आवश्यक है कि शांति प्रक्रिया में केवल शक्तिशाली राष्ट्र ही नहीं, बल्कि प्रभावित क्षेत्र के स्थानीय समुदायों और राष्ट्रों को भी समान रूप से शामिल किया जाए। वास्तविक शांति तभी संभव है जब निर्णय प्रक्रिया समावेशी हो और उसमें सभी पक्षों की आवाज़ सुनी जाए। इसके साथ ही, अंतरराष्ट्रीय समुदाय को “साझा जिम्मेदारी” के सिद्धांत पर कार्य करना होगा, न कि “सत्ता के प्रभुत्व” के आधार पर।
अंततः, पश्चिम और मध्य पूर्व के बीच का संबंध केवल संघर्ष का नहीं, बल्कि संभावित सहयोग का भी हो सकता है। यदि वैश्विक शक्तियाँ अपने स्वार्थों से ऊपर उठकर मानवीय दृष्टिकोण अपनाएँ, तो यह क्षेत्र स्थायी शांति और विकास की ओर अग्रसर हो सकता है। जैसा कि एक समाजशास्त्री ने कहा है--“शांति केवल युद्ध का अभाव नहीं, बल्कि न्याय की उपस्थिति है।” जब तक न्याय और समानता की स्थापना नहीं होगी, तब तक शांति एक अस्थायी विराम मात्र बनी रहेगी।
इस प्रकार, आज की आवश्यकता है संतुलित शक्ति, समावेशी नीति और मानवीय दृष्टिकोण की, ताकि मध्य पूर्व में स्थायी शांति स्थापित हो सके और वैश्विक संबंध अधिक न्यायपूर्ण बन सकें।
डॉ.आकिब जावेद
बांदा, उत्तर प्रदेश

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