कविता - नवीन सभ्यता
यह सभ्यता जन्मी नहीं -
अपलोड हुई है।
जिसमें मनुष्य नहीं रहते,
प्रोफ़ाइल्स बसती हैं।
आँखें अब देखने के लिए नहीं?
सिर्फ़
दिखाने के लिए खुलती हैं।
जितना दिल नहीं धड़कता
उससे ज्यादा तो
नोटिफिकेशन बजते हैं।
यहाँ सत्य का कोई वजूद नहीं
जो ट्रेंड करे वही सत्य है।
संवेदनाएँ?
वो अब "स्किप ऐड" के बाद आती हैं।
संस्कृति को इंस्टाग्राम,फेसबुक में
बेच दिया गया है।
इतिहास की किताबें
शेल्फ पर नहीं,
एल्गोरिद्म के बाहर पड़ी हैं
जहाँ कोई जाता ही नहीं।
रील में रोता हुआ चेहरा
अगले ही पल
हँसते हुए फ़िल्टर में बदल जाता है
यही विकास है।
यहाँ प्रेम भी
टाइप होता है,
और “सीन” होते ही
मर जाता है।
सभ्यता का नया सूत्र -
“मैं दिखता हूँ,
इसलिए मैं हूँ।”
बाकी सब
अनफ़ॉलो कर दिए गए हैं।
डॉ. आकिब जावेद
फोटो - Ranjan/Watercolor Artist

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