अमेरिका की गीदड़ भभकी भी देखी गई।
युद्ध ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि मानवता के नाम पर चल रही वैश्विक मुहिमों की वास्तविकता क्या है। जब धरातल पर निर्दोष लोगों का जीवन संकट में पड़ता है, तब अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की सीमाएँ और उनकी निष्क्रियता खुलकर सामने आ जाती हैं। यह स्थिति न केवल चिंताजनक है, बल्कि वैश्विक व्यवस्था पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े करती है।
संयुक्त राष्ट्र, जिसे विश्व शांति और मानवाधिकारों की रक्षा का प्रमुख आधार माना जाता है, ऐसे संकटपूर्ण समय में अपेक्षित प्रभावशीलता नहीं दिखा सका। उसके प्रयास अक्सर औपचारिकताओं तक सीमित रह जाते हैं, जबकि वास्तविक पीड़ा झेल रहे लोगों तक राहत और न्याय समय पर नहीं पहुँच पाता।
इसी क्रम में, अमेरिका की कड़ी चेतावनियाँ और बयानबाज़ी भी विश्व समुदाय के सामने अपनी सीमाएँ उजागर करती नज़र आईं। तथाकथित ‘सख्त रुख’ कई बार केवल शब्दों तक सीमित रह जाता है, जिसका वास्तविक प्रभाव संघर्ष की दिशा या परिणाम पर नगण्य ही होता है।
इस पूरे परिदृश्य ने यह सोचने पर विवश कर दिया है कि क्या वैश्विक शक्तियाँ और संस्थाएँ वास्तव में मानवता की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध हैं, या फिर उनके प्रयास राजनीतिक हितों और कूटनीतिक रणनीतियों के दायरे में ही सिमट कर रह जाते हैं। वर्तमान समय में आवश्यकता है कि इन संस्थाओं की कार्यप्रणाली में पारदर्शिता, जवाबदेही और वास्तविक संवेदनशीलता को प्राथमिकता दी जाए, ताकि मानवता के नाम पर किए जा रहे प्रयास वास्तव में सार्थक सिद्ध हो सकें।
डॉ. आकिब जावेद

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