ईद_उल_फ़ितर की आप सभी को पुरखुलूस मुबारकबाद

ईद_उल_फ़ितर यानी मिल-जुलकर दुआ करने और खुशी बाँटने का दिन

खुशी यानी ईद, और ईद यानी खुशी—दोनों एक-दूसरे के पर्याय हैं। इस्लाम में दो प्रमुख त्योहारों का प्रमाणिक उल्लेख मिलता है। पहला, रमज़ान के महीने के पूरा होने की खुशी में मनाया जाने वाला ईद-उल-फ़ितर, जिसे मीठी या छोटी ईद भी कहा जाता है। दूसरा, हज की अदायगी के बाद मनाया जाने वाला ईद-उल-अज़हा, जिसे बकरीद या बड़ी ईद के नाम से जाना जाता है।

रमज़ान का पवित्र महीना समाप्ति की ओर होता है, तो ईद-उल-फ़ितर की खुशियाँ हमारे दरवाज़े पर दस्तक देने लगती हैं। एक महीने तक रोज़े रखने के बाद अदा की जाने वाली ईद की नमाज़, दरअसल अल्लाह का शुक्र अदा करने का माध्यम है इस बात के लिए कि उसने हमें सेहत और ताकत दी, ताकि हम इस मुबारक महीने में इबादत कर सकें।

ईद-उल-फ़ितर को मीठी ईद इसलिए भी कहा जाता है क्योंकि इस दिन विशेष रूप से मीठे पकवान, खासकर सेवइयाँ बनाई और खिलाई जाती हैं। यह त्योहार बच्चों के लिए विशेष आनंद का अवसर होता है। नमाज़ के बाद सबसे पहला कार्य अपने आसपास के लोगों में मिठाइयाँ और पकवान बाँटना होता है, जिसमें बच्चों की भागीदारी महत्वपूर्ण मानी जाती है। इससे उनमें साझा करने और आपसी प्रेम की भावना विकसित होती है।

ईद की नमाज़ केवल इबादत ही नहीं, बल्कि एक सामाजिक संदेश भी देती है। यह अल्लाह का शुक्र अदा करने के साथ-साथ आने वाले वर्ष के लिए सेहत, बरकत और हलाल रोज़ी की दुआ करने का अवसर भी है। एक विशेष परंपरा यह भी है कि लोग जिस रास्ते से ईदगाह जाते हैं, वापस उसी रास्ते से नहीं लौटते। इसका उद्देश्य अधिक से अधिक लोगों से मिलना-जुलना, हालचाल पूछना और समाज में किसी जरूरतमंद की पहचान कर उसकी मदद करना होता है।

नमाज़ के बाद लोग कब्रिस्तान जाकर अपने दिवंगत परिजनों और अन्य आत्माओं की शांति के लिए दुआ करते हैं। पहले के समय में, जब संचार के साधन सीमित थे, घर के बुजुर्ग स्वयं रिश्तेदारों और पड़ोसियों के घर जाकर गले मिलते और ईद की मुबारकबाद देते थे। वे एक-दूसरे के घरों के पकवानों का स्वाद भी लेते थे, जो केवल परंपरा ही नहीं, बल्कि एक-दूसरे की आर्थिक स्थिति को समझने और जरूरत पड़ने पर मदद करने का माध्यम भी था।

ईद-उल-फ़ितर का एक महत्वपूर्ण पहलू फ़ितरा (सदक़ा-ए-फ़ितर) है, जिसे हर सक्षम मुस्लिम को ईद की नमाज़ से पहले अदा करना अनिवार्य होता है। यह एक निर्धारित छोटी-सी राशि होती है, जो गरीब और जरूरतमंद लोगों का हक़ मानी जाती है। इसके अतिरिक्त, ज़कात भी इस्लाम का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है, जिसमें व्यक्ति अपनी सालाना बचत का ढाई प्रतिशत हिस्सा गरीबों, अनाथों, बुजुर्गों और असहाय लोगों को देता है।

इस प्रकार, ईद-उल-फ़ितर केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि इंसानियत, भाईचारे, सहानुभूति और सामाजिक जिम्मेदारी का प्रतीक है। यह हमें सिखाती है कि सच्ची खुशी वही है, जो दूसरों के साथ बाँटने से बढ़ती है।

 डॉ. आकिब जावेद 


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