ग़ज़ल संग्रह ख़्वाबों के दरम्यां से माँ के लिए ग़ज़ल

पढ़े दिल से दिल को जोड़ने वाली प्यारी ग़ज़ल

माँ  से   बढ़के  न  मसीहा   कोई   देखा अपना,
ख़ुश  रहें  बच्चें  यही  है  माँ  का  सपना अपना।

पोछने   को    नही   आता   यहाँ   कोई   आँसू,
कौन  है  माँ   के  सिवाए   हमें   कहता  अपना।

देखता  तक  नही बेटा  वो  जो  साहब  हो  कर,
माँ  ने   औलाद  पे  घर -  बार  लुटाया  अपना।

ये   घरौंदा   जो   बसाया  है  पसीने  से  जो,
परवरिश में माँ ने  सब कुछ  तो लुटाया अपना।

बोल  दो, प्यार  से  तुम  भी  यूँ  कभी  बोले  हो,
माँ  के   जैसा  न  मिलेगा  यहाँ  सच्चा  अपना।

माँ  भी तकलीफों को सह  लेती है अक्सर हँस कर,
दर्द  में   माँ  के   अलावा  नही   दूजा   अपना।

रखके  फ़ाक़ा  दी है  परवाज़ वो हमको  'आकिब',
माँ  के  आगे  वो  नही  सर  को  उठाता  अपना।

डॉ.आकिब जावेद 

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