माँ से बढ़के न मसीहा कोई देखा अपना,
ख़ुश रहें बच्चें यही है माँ का सपना अपना।
पोछने को नही आता यहाँ कोई आँसू,
कौन है माँ के सिवाए हमें कहता अपना।
देखता तक नही बेटा वो जो साहब हो कर,
माँ ने औलाद पे घर - बार लुटाया अपना।
ये घरौंदा जो बसाया है पसीने से जो,
परवरिश में माँ ने सब कुछ तो लुटाया अपना।
बोल दो, प्यार से तुम भी यूँ कभी बोले हो,
माँ के जैसा न मिलेगा यहाँ सच्चा अपना।
माँ भी तकलीफों को सह लेती है अक्सर हँस कर,
दर्द में माँ के अलावा नही दूजा अपना।
रखके फ़ाक़ा दी है परवाज़ वो हमको 'आकिब',
माँ के आगे वो नही सर को उठाता अपना।
डॉ.आकिब जावेद
0 टिप्पणियाँ
आपके स्नेहपूर्ण शब्दों और बहुमूल्य टिप्पणी के लिए हार्दिक धन्यवाद।
“आवाज़ सुखन ए अदब” परिवार में आपका स्वागत और सहयोग हमारे लिए प्रेरणा है।
आपका साथ ही साहित्यिक यात्रा को और सुंदर बनाता है।
इसी तरह अपना प्रेम और मार्गदर्शन बनाए रखें। 🌹