कविता भेड़ें

खेतों में चरता 
भेड़ो का झुंड,
वहीं पास में बैठा चरवाहा
मुस्कुरा रहा है देखकर
जिधर चाहो 
उधर हांक दो 
भेड़ो को।

अस्तित्व विहीन
झुंड अक्सर
ऐसे ही सधता है
जैसे साधने से 
एक भेड़
सध जाती हैं
सारी भेड़ें।

आकिब जावेद

एक टिप्पणी भेजें

4 टिप्पणियाँ

आपके स्नेहपूर्ण शब्दों और बहुमूल्य टिप्पणी के लिए हार्दिक धन्यवाद।
“आवाज़ सुखन ए अदब” परिवार में आपका स्वागत और सहयोग हमारे लिए प्रेरणा है।
आपका साथ ही साहित्यिक यात्रा को और सुंदर बनाता है।
इसी तरह अपना प्रेम और मार्गदर्शन बनाए रखें। 🌹