लम्बाई नापती सड़क
मानो नाप रही है,
ज़िंदगी की गति को।
भाग-दौड़,
एकाकीपन,घबराहट
साथ ही साथ नाप लेती है,
अनछुए पहलू,अनसुलझे रहस्य
भीड़ से घिरा मनुष्य,
घबरा रहा भीड़ से।
भूल बैठता है स्वयं को,
वास्तव में जो है।
बस लगता है दिखाने,
स्वयं जो वह नही है।
सड़क को फ़र्क नही पड़ता,
वो अंनत काल से लदी हुई है,
ऐसी ही भीड़ से,
मनुष्यों से,पेड़ो से,
जीव-जंतुओं से।
समय के साथ-साथ
मनुष्यों की तरह,
परिवर्तित हुई सड़क,
सो रही है चिरनिद्रा में।

-आकिब जावेद