सिल रहा था मोची
फटे जूते को,
लेकिन ऐसा लगा
जैसे सिली हो
उसने,
किसी की इज़्ज़त।
फटे जूते के छेद से
समाज करता है
आकलन,
किसी की प्रतिष्ठा,
किसी के रुतबे का,
और उस मोची ने
सिल दिया उस
फटे जूते को,
और बचा ली
किसी की
इज़्ज़त।
लेकिन,
कहाँ कोई?
भर पाता है,
उस मोची की 
आर्थिक,सामाजिक,
स्थिति एवं क़िस्मत,
उसकी इज़्ज़त को!

-आकिब जावेद