ग़ज़ल- हम तसव्वुर में ग़ज़ल कहते हों जैसे

काफ़िया-अते
रदीफ़-हों जैसे

2122 2122 2122

आप ही अशआर में दिखते हों जैसे
हम तस्व्वुर में ग़ज़ल कहते हों जैसे

वो  हमारे  सामने हैं अजनबी से
ऐसे हम यादों में ही मिलते हों जैसे

सर्द रातों के किसी अहसास में हम
उम्र भर अहसास को लिखते हों जैसे

खूब बरसीं बारिशें हम पर ग़मों की 
हम ग़मो की बारिश में खिलते हों जैसे

उसने ही तो प्यार को काबा बताया
वो  नमाज़े  इश्क़ में मिलते हों जैसे

-आकिब जावेद

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4 टिप्पणियाँ

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