ग़म की चादर.....ओढ़कर
अपने पेट को....मरोड़कर
खून पसीना.....निचोड़कर
पाई-पाई पैसे .. ..जोड़कर
कोरोना से यूँ ......जूझकर
रास्तों के पत्थर....तोड़कर
भूखमरी से रिश्ता..जोड़कर
शहर से यूँ मुह......मोड़कर
झोपड़ पट्टी सब...छोड़कर
गाँव से रिश्ता......जोड़कर
छोटे छोटे बच्चो को लेकर
उस शहर को ......छोड़कर
अपनों से दिल......जोड़कर
अमीरों से कोरोना.....लेकर
उस शहर को यूं......छोड़कर
बोरिया बिस्तर सब ....लेकर
अपने गाँव हम..हम चल दिए
अपने गाँव हम..हम चल दिए
-आकिब जावेद
- बाँदा,उत्तर प्रदेश
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