हम रोज़ थोड़ा थोड़ा साँचो में ढल रहे हैं।।

कल रात ख्वाबो में आये, वो बदल रहे हैं
हम रोज़ थोड़ा थोड़ा साँचो में ढल रहे हैं।।

मोहब्बत का अफ़साना रहा यूँ ज़माने में
नफ़रत को मुहब्बत से अब छल रहे हैं।।

महसूस हुई है यूँ कमी हमे भी ज़िन्दगी में
हम रोज़ थोड़ा थोड़ा साँचो में ढल रहे हैं।।

मुश्किल बड़ी थी,यूँ अब मज़बूरी बहुत थी
साथ पाने के ख़ातिर घर से निकल रहे हैं।।

बेखबर रहे वो यूँ अब दिल के खबर से
याद में अब पत्थर दिल भी पिघल रहे हैं।।

वो ख़ुश्क चेहरा,लबो रुख़सार में नाम मेरा
तन्हाइयों में भी तुझे सोच कर मचल रहे हैं।।

मौसम का आना जाना,तेरी याद दिलाता हैं
यूँ ही नही अब बिन बहर लिख ग़ज़ल रहे हैं।।

अँधेरे दिल में उजाला चाहिए,सहारा चाहिए
इश्क की लौ को"आकिब यूँ जलाए चल रहे हैं।।

-आकिब जावेद

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