खुद ही खुद के नज़रो में गिरता देखा।।

मोहब्बत का यूँ जमाने में सिलसिला देखा
आपस के मेलज़ोल का घटता दायरा देखा

कायदा खुद का खुद में खोखला देखा
निभाते दुसरो को दूसरे का रास्ता देखा

तर्जुमा ज़िन्दगी का ये बतलाता रहा
खुद ही खुद के नज़रो में गिरा देखा

मदहोशी का आलम कुछ यूँ रहा उनपर
मय में रहे ज़ाम का खाली प्याला देखा

महसूस होती है कोई खुशी तेरे आ जाने से
ज़िन्दगी को अपने महकते  हुए उठा देखा।।

-आकिब जावेद

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