बेमौसम पतझड़

रेत के जैसे फिसलती रहती हैं जिंदगी
पानी के मानिंद बहती चली जा रही हैं!

कौन कंहा किस ओर कब चला जा रहा हैं
समुद्र बिना किनारे के बहते चला जा रहा हैं।

सोचते हैं जो भी हम अक्सर इस जिंदगी में
वो बिन सोचे समझे होता चला जा रहा हैं।

अब नही कोई सिकवा ना ही कोई गिला हैं
ना वो हमे मिला हैं,कई मिलते चले जा रहे है।

दुश्मनो से बैर करना नही हैं ये फितरत मेरी
हम हमेशा सबसे सलीके से मिलते चले जा रहे है।

जिंदगी हैं ये एक मौसम की तरह
पल पल में ये बदलती चली जा रही हैं।

सर्द गर्म बरसात हर तरीके से जिया इसको
ये बेमौसम पतझड़ की तरह गुज़रती चली जा रही हैं।

रेत के जैसे फिसलती रहती हैं जिंदगी
पानी के मानिंद बहती चली जा रही हैं!

~आकिब जावेद



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