फ़िक्र

वो सर्द रातो की कड़कती ठण्ड और तेरा मिलना जैसे कोई जादुई एहसास सा कराये जा रहा था।
लेकिन मन में एक कशिश और कोई डर भी समाये जा रहा था,कंही किसी ने देख लिया तो।
लेकिन मन कंहा किसी की कभी सुनता है, ये तो अपना ही करता है, पागल सा दीवाना सा बेगाना सा,हां ऐसा ही दिल होता है।
पास में रखी हुई पानी की बोतल का उठाना होता है, तभी पास से एक आवाज सुनाई पड़ती है।
अचानक से आती हुई आवाज से कोमल एकदम से चौक सी जाती है, और कमल को वंहा से जाने के लिए कहती है।
लेकिन कमल उसकी उस मनमोहक खुशबू और एहसास को छोड़कर कंहा जा सकता था।
अरे जाओ यंहा से, सुन कंयू नही रहे हो कमल।
ऐसा कहते हुए कोमल मुह बना लेती है।
कैसे चला जाऊ,अचानक तुम जाने के लिए कह रही हो।
कमल तेजी के साथ कोमल से कहता है।
कोमल बातो को सुन रही है, वह शांत हो जाती है, क्या कहे?
क्या बोले?
क्या उत्तर दे?
कोमल निरुत्तर दिए अपनी जगह पे खड़ी रहती हैं।
लोकलाज सामाज का भय अब उसे खाये जा रहा था ।
क्या करे आखिर ?कंयू ऐसा कदम उठाया?
किसी ने देख लिया होगा?कोई क्या सोचेगा?
मेरे पिताजी से किसी ने बता दिया तो?
अब कोमल के दिमाग में ये प्रशन्न आ रहे थे।
लेकिन वो कमल से कह नही पा रही थी बड़ी ही आसमंझस में आखिर क्या करे?
अपने प्रेम को देखे या समाज को।
वो समाज जो प्रेम की स्वीकृति कभी नही देता ना ही देगा।
लेंकिन वो हिम्मत से काम लेती है,कमल को समझा देती है कि कल मिलते है।
वो ऐसा कह कर अपने दिल में पत्थर रख कर अपने प्रियतम से जुदा होती है।
घर पर सब बैठे थे।
कंहा से आयी हो ?
कंहा गयी थी?
इतनी देर?
सवालो की झड़ी, एक साथ ही कई सारे सवालो की बौछार कर दी गयी हो।
घर वालो ने पूछा कोमल से,
अपने दोस्त के साथ में थी ऐसा कह कर कोमल अपने कमरे में चली जाती है।
लेकिन कोमल ये सोच में पड जाती है कि क्या हम अब भी इतने पिछड़े है कि अपने सोच को नही बदल पा रहे हैं।
इतने पढ़े लिखे होने के बावजूद भी हमें अपनी सुरक्षा की फ़िक्र हमेशा घर वालो को सताए रहती हैं।
हम अपनी आज़ादी को अपने अधिकार के साथ नही जी पाती हैं।
इन सब को सोचते हुए कोमल की नींद लग जाती है और वह सो जाती हैं।

लेखक
-आकिब जावेद,बिसँडा

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