कविता - तनाव

आज पढ़िए डॉ.आकिब जावेद की कविता तनाव 

तनाव चुपके से आता है,
धूप भरे आँगन में अँधेरा बिछाता है।
होंठों की हँसी चुरा लेता है,
आँखों में अनकहे प्रश्न छोड़ जाता है।

किसी के लिए वह
सपनों के टूटने का डर है,
किसी के लिए बाज़ार की गिरती कीमतें,
तो किसी के लिए
चूल्हे में आग जलाने की फ़िक्र है।

ऊँची इमारतों के कमरों में भी
तनाव की दस्तक सुनाई देती है,
पर झोपड़ी की टपकती छत के नीचे
उसकी आवाज़ और गहरी हो जाती है।

मज़दूर के पसीने में घुला रहता है तनाव,
रिक्शे के पहियों के साथ चलता है,
ईंटों का बोझ उठाते कंधों पर
दिन भर धूप बनकर जलता है।

बच्चे की भूखी आँखें जब
रोटी का सपना देखती हैं,
माँ की पलकों पर तब
चिंताओं की नमी ठहर जाती है।

पेट की आग बुझाने की जद्दोजहद में
कितनी इच्छाएँ राख हो जाती हैं,
कितने अरमान बिना बोले ही
समय की धूल में खो जाते हैं।

फिर भी आदमी जीता है,
उम्मीद का छोटा-सा दीप जलाकर,
अँधेरों से लड़ता है हर दिन,
अपने टूटे हुए साहस को सँभालकर।

तनाव चाहे जितना गहरा हो,
जीवन का सूरज डूबता नहीं,
एक नई सुबह की आस में
जीवन चलता रहता है।

डॉ.आकिब जावेद 

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10 टिप्पणियाँ

  1. बहुत बहुत शुक्रिया आपका

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  2. बहुत बहुत शुक्रिया आपका

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  3. बहुत संवेदनशील और दिल को छू लेने वाली कविता है। आपने तनाव को हर वर्ग के इंसान की जिंदगी से जोड़कर दिखाया है। मजदूर की थकान, माँ की चिंता और भूखे बच्चे की उम्मीद पढ़कर मन भावुक हो जाता है। सच तो यह है कि तनाव किसी एक व्यक्ति की समस्या नहीं, बल्कि आज के समय की एक बड़ी सच्चाई है। बहरहाल, मेरा यहाँ आने का एक कारण और भी है। हम लोग मुंशी प्रेमचंद जी की आगामी पुण्यतिथी ३१ जुलाई २०२६ के अवसर पर प्रेमचंद महोत्सव के अंतर्गत "५० दिनों में ५० कहानियाँ" बनाने, सुनाने (और जुटाने की भी!) की ओर प्रयासरत है. अगर आपकी रूचि हो तो इस अभियान में आपका सहर्ष स्वागत है.

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    धन्यवाद

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    1. आपके स्नेह के लिए आभारी हूँ,सादर आभार आपका

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आपके स्नेहपूर्ण शब्दों और बहुमूल्य टिप्पणी के लिए हार्दिक धन्यवाद।
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