लेख - फर्जी दिव्यांगता प्रमाण पत्र: योग्यता पर भारी होता छल

आज का भारत समानता, समता, बंधुत्व और न्याय जैसे संवैधानिक मूल्यों पर खड़ा है। लेकिन ज़मीनी हकीकत कई बार इन आदर्शों को आईना दिखा देती है। हाल के समय में एक गंभीर समस्या सामने आ रही है - कुछ लोग फर्जी दिव्यांगता प्रमाण पत्र बनवाकर नौकरी और उच्च पदों तक पहुँच रहे हैं, जबकि वास्तव में वे पूरी तरह सक्षम होते हैं।

दिव्यांग आरक्षण की व्यवस्था समाज के उन लोगों को आगे लाने के लिए बनाई गई थी जो शारीरिक या मानसिक रूप से किसी कमी के कारण पीछे रह जाते हैं। 
इसका उद्देश्य सहानुभूति नहीं, बल्कि समान अवसर देना है। लेकिन जब इसी व्यवस्था का दुरुपयोग होने लगे, तो यह न केवल कानून के साथ धोखा है, बल्कि उन मेहनतकश और होनहार युवाओं के साथ भी अन्याय है जो सालों तक ईमानदारी से तैयारी करते रहते हैं।

आज स्थिति यह है कि जो लोग दिन-रात मेहनत कर प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं, वे चयन से वंचित रह जाते हैं, और जो लोग झूठे प्रमाण पत्र के सहारे सिस्टम को चकमा देते हैं, वे अफसर बनकर ऐश कर रहे हैं। यह दृश्य केवल दुखद नहीं, बल्कि हमारे लोकतांत्रिक मूल्यों पर सीधा प्रहार है।
अभी एक जीता-जागता उदाहरण सबके सामने है, जहाँ जाँच चल रही है और सच्चाई धीरे-धीरे उजागर हो रही है। आरोपी का भाई ही सच बयान कर रहा है, जिससे पता चलता है कि झूठ कितनी दूर तक फैला हुआ था। ऐसे मामलों से यह साफ है कि समस्या केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि व्यवस्थागत भी है।
जब फर्जी लोग सिस्टम में घुस जाते हैं, तो समता, समानता, बंधुत्व और न्याय जैसे शब्द केवल किताबों में रह जाते हैं। ज़रूरत है कि जाँच प्रक्रिया को और सख़्त किया जाए, प्रमाण पत्रों की डिजिटल व मेडिकल सत्यता की दोहरी जाँच हो, और दोषियों को कड़ी सज़ा मिले।

क्योंकि अगर मेहनत की जगह छल जीतने लगे, तो देश का भविष्य कमजोर हाथों में चला जाएगा।

समाज तभी मजबूत बनेगा जब ईमानदारी को इनाम और धोखाधड़ी को दंड मिलेगा।

आकिब जावेद 

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