कविता बूंदें निकलती है धरा की यात्रा में

वर्षा की बूंदें 
धरा में गिरते ही
अपना अस्तित्व
बदल देती है।

बूंदें अर्पित करती है 
अपना अस्तित्व
जिसके लिए 
वो अम्बर से लड़ कर
धरा की यात्रा में 
निकलती है
जीवनदायनी
जल बनकर।

आकिब जावेद

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8 टिप्पणियाँ

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