हम यहाँ दैर - ओ - हरम में नही दिल में रहें
सबके दिल मे हो यहां रार ज़ुरूरी तो नहीं।
सर - फिरे लोग ही करते है यहां खून ख़राबा
सब हों उल्फ़त में गिरफ्तार ज़ुरूरी तो नहीं।
✍️आकिब जावेद
दैर-ओ-हरम = का'बा और मुर्तीगृह, मंदिर-ओ-का'बा,मंदिर और मस्जिद
8 टिप्पणियाँ
जी नमस्ते ,
जवाब देंहटाएंआपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार(२८-०५-२०२२ ) को
'सुलगी है प्रीत की अँगीठी'(चर्चा अंक-४४४४) पर भी होगी।
आप भी सादर आमंत्रित है।
सादर
बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीया जी💐💐
हटाएंबहुत सुंदर सृजन
जवाब देंहटाएंसादर आभार आदरणीय जी💐
हटाएंबहुत ही बढ़िया कहा।
जवाब देंहटाएंबहुत ही नवाज़िशें
हटाएंIt's great to have your self-written article.
जवाब देंहटाएंThank you so much
हटाएंआपके स्नेहपूर्ण शब्दों और बहुमूल्य टिप्पणी के लिए हार्दिक धन्यवाद।
“आवाज़ सुखन ए अदब” परिवार में आपका स्वागत और सहयोग हमारे लिए प्रेरणा है।
आपका साथ ही साहित्यिक यात्रा को और सुंदर बनाता है।
इसी तरह अपना प्रेम और मार्गदर्शन बनाए रखें। 🌹