वर्षा ऋतु हूँ
अम्बर में रहूँ मैं
धरा महके
बहती जाए
एक छोर से दूजा
अंत नहीं है
पास होती हूँ
खिल उठते सब
कहते दिन
#akib
वर्षा ऋतु हूँ
अम्बर में रहूँ मैं
धरा महके
बहती जाए
एक छोर से दूजा
अंत नहीं है
पास होती हूँ
खिल उठते सब
कहते दिन
#akib
"सपने वो नहीं जो नींद में देंखें,सपने वो हैं जो आपको नींद न आने दें - ए० पी०जे०अब्दुल कलाम "
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1 टिप्पणियाँ
खूबसूरत अहसास
जवाब देंहटाएंसुंदर हाइकू।
पधारे- शून्य पार
आपके स्नेहपूर्ण शब्दों और बहुमूल्य टिप्पणी के लिए हार्दिक धन्यवाद।
“आवाज़ सुखन ए अदब” परिवार में आपका स्वागत और सहयोग हमारे लिए प्रेरणा है।
आपका साथ ही साहित्यिक यात्रा को और सुंदर बनाता है।
इसी तरह अपना प्रेम और मार्गदर्शन बनाए रखें। 🌹