यूँ तो महबूब की आँखों में डूबता हूँ मैं!! ग़ज़ल

यूँ तो महबूब की आँखों में  डूबता हूँ  मैं
दिल की गहराइयों को अब नापता हूँ मैं।।

उनकी साँसों में ही अब समाया हुआ
खुद को खुद में ही यूँ अब ढूंढता हूँ मैं।।

चाँद तारो की भी परवाह नही अब मुझे
उनकी नज़रो से गिर कर अब टूटता हूँ मैं।।

लफ्ज़ लफ्ज़ में ही मुझको तू पुकारता रहा
मैंने खुद को समझ लिया कि नाख़ुदा हूँ मैं।।

बेवफ़ाई का खौफ़ खाया हुआ मंज़र रहा
यूँ रोज़ रोज़ नए इम्तिहाँ से गुज़रता हूँ मैं।।

बादलो ने यूं अब मेरे साथ छेड़खानी की
सूखा मंज़र रहा ज़िन्दगी भर,अब नया हूँ मैं।।

ज़िन्दगी की कैद से अब रिहाई दे मुझे
तेरे बिना यूँ ज़िन्दगी में सिरफिरा हूँ मैं।।

यूँ सब-ए रात मुझसे यूँ मेरे साये ने कहा
आकिब"तुझको अब ठिकाने लगा रहा हूँ मैं।।

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गिरह का शेर

हमनवां समझा,समझा राजदां भी अब तुझे
नए सफ़र नए मौसम का क़ाफ़िला हूँ मैं।।
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:आकिब जावेद

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