कविता: - आदमी ही आदमी

दुनिया के भीड़ में बढ़ रहा आदमी
आपस की होड़ में पिस रहा आदमी

रँजोरक्त के प्यासे एक दुसरे के
अब खूनी भेड़िया बन रहा आदमी

देखना दुश्वार हो गया,तरक्की किसी की
अपने अहं में ही घिर के रह गया आदमी

आदमी ही आदमी का दुश्मन यंहा पर
लोगो को बेमौत ही मार रहा आदमी

जात-पात धर्म के नाम पर,यंहा
ठग रहा एक-दुसरे को आदमी

हेय नज़रो से देखने का चलन,
कुछ बढ़ सा रहा
एक दुसरे से खूब जल रहा आदमी

अब विषधर भी चर्चा कर रहे,देखो
कैसे एक दुसरे को डस रहा आदमी

जानवरो में भी मिल जायेगी वफादारी,लेकिन
देखो अपने देश का ही गद्दार हो रहा आदमी

राह में पत्थर बिछाए बैठा रहा,आदमी
खुद का,खूब शिकार कर रहा आदमी!!

-आकिब जावेद



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