भाग दौड़ की जिंदगी में,
याद आते है अब वो दिन
जब हम छोटे बच्चे थे,
और कटते थे हस हस कर दिन
सुबह सुबह जल्दी उठ कर,
अब सिर्फ भागम दौड़ है
कंही जाने में देर ना हो जाए
अब हमारी सिर्फ यही सोच हैं
ना ढंग से खा पाते,ना ढंग से सो पाते है
अब तो घर चलाने की ही सिर्फ यही सोच है
ना किसी से होती बात,ना दोस्तों से होती मुलाक़ात
अब हम सिर्फ अपने कामो में ही इतने व्यस्त है
इस व्यस्त समय में हमको,अब कुछ काम करना है
माँ के पैर दबाने है,दो चार बाते पापा से करनी है
फिर स्कूल लौट कर जाना है
छीनकर दोस्तों से खाना खाना है
जिंदगी के इस सफर में हम इतने उलझ सा गये है
कुछ साथ छूट से गये है, कुछ भूल से गये हैं
लौट के आ जाये अब वो दिन
जिसमे भीगा करते थे,बरसात के दिन
'आकिब'तुझको याद आते है 'वो दिन'
जिसमे पैसे मिलते थे,'गिन-गिन।।
-आकिब जावेद

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