वो हिज्र की बाते

 

शहर दर शहर यही रंजो गम फैला है,

तू मुश्लशल हर तरफ रंवा है

इत्तफाक और बेचैनियां हर तरफ फ़ैली है,

इंशान अंदर ही अंदर मरा है

गुफ़्तुगू भी होती है अब कुछ इस तरह,

लगता है बातो में मिलावट हुई है

ऐतेबार ना रहा लोगो को लोगो से,

मुश्लशल दिल में आग लगी है

विश्वास करके भरोसा तोडा लोगो ने,

अब तो दिल में विश्वास ही ना रहा है

पत्थर दिल हो गए हैं अब सभी,

अब कोई मोम की मूरत ना रहा है

होश में नही है हम अब यहाँ,

आरजू तमाम मर सी गयी है

वो हिज्र की बाते वफ़ा सब बेमतलब की,

तमाम उम्र हम सिर्फ सफर में ही रहे

यादे बाते सब बेफजूल है,

कोई किसी को नही याद करता भूल जाने के बाद

दिल की बात दिल में मत रख आकिब,

बाद मरने के याद करने वाला नही कोई यंहा

हो सके तो बेहोशी में कह दे वो सब कुछ

जो होश में रह कर कभी ना कह सका!!

आकिब जावेद ,बिसँडा

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