“...आमजन
व्यवस्था से लाचार है,
महाजनों का
कैसा यह व्यवहार है।
पूँजीपतियों को
मिलती सौगात,
ग़रीबों पर
चौतरफा मार है।
बार-बार धक्के खाकर
आख़िर हो गया मजबूर,
कब्र से निकालकर कंकाल
हक़ लेने को दिखाया सबूत।
दुरूह व्यवस्था
सदियों से
आमजन को सताती है,
पूँजीवादियों से करती प्रेम,
ग़रीबों को
चौखट से भगाती है...”
-- डॉ.आकिब जावेद
2 टिप्पणियाँ
आपने बहुत सीधी और कड़वी सच्चाई लिख दी है, जो हर किसी को चुभती है। मुझे आपके ये बात पसंद आई कि आपने बिना घुमाए-फिराए व्यवस्था का असली चेहरा दिखाया।
जवाब देंहटाएंबहुत बहुत शुक्रिया आपका
हटाएंआपके स्नेहपूर्ण शब्दों और बहुमूल्य टिप्पणी के लिए हार्दिक धन्यवाद।
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