मनुष्य ने
ओढ़ा हुआ है
मनुष्यता का लबादा।
उतारकर फेंक देता है,
मौका मिलते ही
और बन जाता है
जानवर
क्रूर, वहसी,जंगली
समाज ने
कम्फर्ट जोन
बना लिया है।
आकिब जावेद
मनुष्य ने
ओढ़ा हुआ है
मनुष्यता का लबादा।
उतारकर फेंक देता है,
मौका मिलते ही
और बन जाता है
जानवर
क्रूर, वहसी,जंगली
समाज ने
कम्फर्ट जोन
बना लिया है।
आकिब जावेद
"सपने वो नहीं जो नींद में देंखें,सपने वो हैं जो आपको नींद न आने दें - ए० पी०जे०अब्दुल कलाम "
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5 टिप्पणियाँ
वाह
जवाब देंहटाएंबहुत बहुत शुक्रिया सर
हटाएंमनुष्यता का लबादा नहीं वास्तविक मनुष्यता का जन्म होना चाहिए, तभी समाज आगे बढ़ेगा
जवाब देंहटाएंबहुत सुन्दर
जवाब देंहटाएंबहुत शुक्रिया आपका
हटाएंआपके स्नेहपूर्ण शब्दों और बहुमूल्य टिप्पणी के लिए हार्दिक धन्यवाद।
“आवाज़ सुखन ए अदब” परिवार में आपका स्वागत और सहयोग हमारे लिए प्रेरणा है।
आपका साथ ही साहित्यिक यात्रा को और सुंदर बनाता है।
इसी तरह अपना प्रेम और मार्गदर्शन बनाए रखें। 🌹