छू लेना गर तुम कभी भी जिन्दगी में बुलंदी को
अपनों को ना भूल जाना पाकर तुम बुलंदी को
कठिन आसान सुख दुःख हर मोड़ में साथ देते
पग पग में छण छण याद रखो पाकर बुलंदी को
आशा नही विश्वास है हाथ में अपने मैं पाउँगा
एक न एक दिन कुछ न कुछ करके दिखाऊंगा
बालक हूँ नादां हूँ मगर मेरे हाथों पे न जाओ यूँ
लगन समर्पण मेहनत से बुलंदी को मैं पाऊँगा
-आकिब जावेद
(मौलिक/स्वरचित)
0 टिप्पणियाँ
आपके स्नेहपूर्ण शब्दों और बहुमूल्य टिप्पणी के लिए हार्दिक धन्यवाद।
“आवाज़ सुखन ए अदब” परिवार में आपका स्वागत और सहयोग हमारे लिए प्रेरणा है।
आपका साथ ही साहित्यिक यात्रा को और सुंदर बनाता है।
इसी तरह अपना प्रेम और मार्गदर्शन बनाए रखें। 🌹