मुश्किलों से अब अपने हालात संभलते हैं
दिल में बसे हुए हैं,वही अब हमको छलते हैं
दुनियादारी का रिवाज़ हमको नही आता
लोग पल भर में अपना ठिकाना बदलते हैं
कोई अमीर हो या कि यहाँ कोई फ़कीर
मयकदे के रस्ते पर साथ साथ चलते हैं
कोरे कागज में थी,मेरे दिल की दास्ताँ
हाले दिल बयाँ ना हुआ,यूँ अब मचलते हैं
कुछ सच को छुपाये,मन में घबराये
बातो को वो मासूमियत से बदलते हैं
लब को अपने सदा वो सिले रहते हैं
छलिया हैं वो ऐसे ही सबको छलते हैं
पत्थर दिल थे,वो ऐसे पत्थर ही रहे
कहाँ वो किसी के प्यार से पिघलते हैं
गिन गिन के गिनते रहे अब ये सारे दिन
खुद में खुद को डुबोये'आकिब खुद ढलते हैं
-आकिब जावेद
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