कविता : नोटबंदी

सब पड़े सुकूँ से थे,अपने हाल
नही फ़िक्र किसी को,
थी कल की!
सब अपने मन में,अपने धुन में
यूँही घूम-फिर रहे थे सब के सब!
कोई दफ्तर में था,तो कोई था घर पे
कोई था रेस्तोरां में गर्लफ्रेंड के साथ
था कोई हँस रहा बीवी बच्चो के साथ!
किसी ने अपने कल बेचे ही थे खेत
किसी ने दहेज़ में ले लिया था खूब माल!
कि अचानक रात में सबने,
सुन लिया था कुछ ऐसा,
कि हक्के बक्के रह गये,
कि क्यू हुआ ये ऐसा!
चलते थे जो चलन में नोट,
कहते जिन्हें थे हम हज़ार,पंचसौहा!
इक ही झटके में हो गए थे रद्दी के भाव,
सब के चेहरे के जैसे उतर गये हो भाव!
जो थे बेफिक्र,बिंदास और झक्कास,
वो सब हो गये इस निर्णय से उदास!
सबको बैंक की लाइन में लगा डाला,
ना जाने कित्ते नियम भी बना डाला!
लेकिन
इसका कुछ ना असर हुआ,
जैसे नोटबंदी इक जहर हुआ!
देखो पूरा देश त्राही त्राही मान हुआ,
कितनो ने जान की बाज़ी हार दिया!
दुकानदार,किसान,मजदूर सब पर इसका असर पड़ा,
गृहणियों के तो घर पर जैसे डाका पड़ा,
जितने इखट्टे किये रहे बरसो से रूपये,
इक झटके में ही पति ने हड़प लियें!
सब के सब परेशान हुए,कुछ ना असर पड़ा
जैसे नोटबंदी इक जहर हुआ!
सपना था कि,
कालाबाज़ारी,आंतकवाद,भ्रस्टाचार में लगेगी रोक,
लेकिन वो तो सपना ही बना रहा!
इन सबमे कुछ ना असर पड़ा,
जीडीपी लेकिन लुढ़क पड़ा!
अर्थव्यवस्था चरमरा सी गयी,
हालात में कुछ ना सुधार हुआ!
देखो नोटबंदी एक जहर रहा,
सरकार पर कुछ ना असर पड़ा!!

-आकिब जावेद







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