कविता : ख़ामोशी ही ख़ामोशी

ख़ामोशी ही ख़ामोशी,
छाई हैं हर तरफ,कोई
अब किसी से कहता क्यू नही हैं?
कोई कुछ भी कहे,
कोई कुछ भी करे,
कोई कुछ भी सुने,
सब सुनने को तैयार,
कोई,
अब किसी से कहता क्यू नही हैं?
समाज में खूब हो रही बुराई,
कंही किसी से हो रही लड़ाई,
आपस में ही हो रही भिड़ाई,
तो फिर,कोई
अब किसी से कहता क्यू नही हैं?
लड़का अपने पिता का ना सुने,
लड़की अब अपनी माँ से लड़े,
भाई भाई की अब हो लड़ाई,
पड़ोसी करे एक दूसरे की बुराई,
ना रही अब जमाने में भलाई,
कोई,
अब किसी की सुनता क्यू नही हैं?
ख़ामोशी ही ख़ामोशी,
छाई हैं हर तरफ,कोई
अब किसी से कहता क्यू नही हैं?
ना रही मानवता किसी में,
ना ही करे कोई उपकार,
भूल गए सभी अपने संस्कार,
समाज में नैतिकता बची नही हैं,
कोई,
अब किसी की सुनता क्यू नही हैं?
माँ-बहनों की खूब देते गाली,
घर की इज़्ज़त को तार करे,
मान-सम्मान का करे हनन,
खूब छेड़-छाड़ और बलात्कार करे,
तो फिर कोई,
अब महिलाओं की इज़्ज़त क्यू करता नही हैं?
सभी बेटियो को देवी माने
करे खूब पूजा सत्कार,
मौका मिलते ही,
बच्चियों से होते बलात्कार,
जन्म देने से पहले ही अब,
बच्चियां देती हैं जीवन हार,
तो फिर कोई,
अब बच्चियों को बचाता क्यू नही हैं?
करता हूँ सिर्फ एक निवेदन,
सब मिलकर हम यह प्रण ले,
महिला,बच्चियों,बुजुर्गो के,
सारे के सारे कष्ट हर ले,
हमेशा उनका सम्मान करें,
अब ना कोई उनका अपमान करे,
आओ मिलकर,
सब से अब यही करे निवेदन!!
सब से अब यही करे निवेदन!!
-आकिब जावेद









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