कविता - मृगतृष्णा "अधरों की मिठास"
तुम्हारे अधरों की
मिठास
तृप्त कर जाती है
जीवन की हर प्यास,
मृगतृष्णा-सा मन
भटकता रहता है
मरीचिका के उजास।
उद्वेलित होती हैं
भावनाएँ
प्रेम की खोज में,
लेकिन
नेत्र ठिठक जाते हैं
क्षण भर
तुम्हें निकट पाते ही।
चक्षु निर्जन वन-से
काँपते हुए,
हर पल डगमगाता मन,
पर प्रेम के
होने का यह एहसास
दे जाता जीवन को
नया लक्ष्य, नया पथ।
आकिब जावेद
बांदा, उत्तर प्रदेश,भारत

6 टिप्पणियाँ
Wah
जवाब देंहटाएंबहुत शुक्रिया आपका
हटाएंप्रेम के
जवाब देंहटाएंहोने का यह एहसास
दे जाता जीवन को
नया लक्ष्य, नया पथ।
यकीनन प्रेम पथ प्रदर्शक होता है
बहुत बहुत शुक्रिया आपका
हटाएंसुंदर रचना
जवाब देंहटाएंबहुत बहुत शुक्रिया आपका
हटाएंThanks For Visit My Blog.