कविता - बसंत

जीवन के कितने ही बसंत बीत गए,
ऋतुएँ आईं, ठहरीं, फिर चली गईं,
पर नहीं आई कभी
गरीब के हिस्से की वह खुशहाली,
जिसकी राह में
उसका हर बसंत बुझ गया।

सूरज हर सुबह करता रहा वादा,
कि किरणें पहुँचेंगी उसकी चौखट तक,
पर झोपड़ी की छत से टपकती
बारिश में सारे सपने घुल गए।

खेत मनुहार करके बुलाते रहे,
पर हथेलियों में रहीं सिर्फ़ लकीरें,
जो हर साल बस यही कहती रहीं - 
“अगला बसंत तुम्हारा होगा”,
और हर बार की तरह बसंत
महलों की चौखट पर जा ठहरा।

गरीब के हिस्से में आया तो
सिर्फ़ इंतज़ार, सिर्फ़ संघर्ष,
और फिर वही उम्मीद,
जो रोज़ शाम को थककर
उसकी पलकों पर सो जाती है।

जीवन के कितने ही बसंत
इंतज़ार में बीत गए,
पर उसके जीवन में
अब तक बसंत नहीं आया।

 आकिब जावेद 

एक टिप्पणी भेजें

4 टिप्पणियाँ

  1. “अगला बसंत तुम्हारा होगा”, पर कब
    सुन्दर प्रस्तुति

    जवाब देंहटाएं
  2. इसी उम्मीद में गुजर जाता है जीवन...
    सुन्दर सृजन ।

    जवाब देंहटाएं

Thanks For Visit My Blog.