हुआ आइना रूबरू भी मेरे,
तमन्ना बहुत थी मुलाक़ात की।
बहारों ने मिलकर उजाड़ा मुझे,
खिली कब कली मेरे जज़्बात की।
मैं हाथों को अपने न फैलाऊंगा,
नहीं चाहिए ज़ीस्त ख़ैरात की।
-आकिब जावेद
"सपने वो नहीं जो नींद में देंखें,सपने वो हैं जो आपको नींद न आने दें - ए० पी०जे०अब्दुल कलाम "
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